निबंध
यूनिवर्सल बेसिक इनकम और भारत: मध्य प्रदेश का प्रयोग और लाडली बहना
मध्य प्रदेश में हर महीने लगभग 1.25 करोड़ महिलाओं के बैंक खातों में लाडली बहना योजना के 1,500 रुपये आते हैं।1 यह अकेला राज्य नहीं है। PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार महिलाओं को लगभग बिना शर्त नकद देने वाले राज्य 2022-23 में दो थे, जो 2025-26 में बारह हो गए, और ये राज्य मिलकर इन योजनाओं पर 1,68,040 करोड़ रुपये ख़र्च करने का अनुमान रखते हैं, यानी GDP का लगभग 0.5%।2
इससे दस साल से भी पहले, इसी मध्य प्रदेश के इंदौर ज़िले के गाँवों में दुनिया के सबसे ज़्यादा उद्धृत बेसिक इनकम प्रयोगों में से एक चला था। इस लेख में हम देखेंगे कि उस प्रयोग में क्या हुआ और क्या मिला, उसकी सीमाएँ क्या थीं, 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण ने यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) के बारे में क्या कहा, और आज की लाडली बहना, लाडकी बहीण और PM-KISAN जैसी योजनाएँ बेसिक इनकम से कितनी क़रीब या दूर हैं।
मध्य प्रदेश का प्रयोग (2011–2013)
यह प्रयोग सेल्फ़-एम्प्लॉयड विमेंस एसोसिएशन (SEWA) ने चलाया और पैसा UNICEF ने दिया।3 बड़े प्रयोग में आठ गाँवों के हर पुरुष, महिला और बच्चे को हर महीने बेसिक इनकम दी गई, और उनकी तुलना 12 मिलते-जुलते "कंट्रोल" गाँवों से की गई। जून 2011 से मई 2012 तक हर वयस्क को 200 रुपये और हर बच्चे को 100 रुपये महीना मिले; फिर महँगाई के हिसाब से रक़म 50% बढ़ाकर 300 और 150 रुपये की गई, जो नवंबर 2012 तक दी गई। ग़रीबी रेखा पर जी रहे परिवारों के लिए यह उनके ख़र्च का लगभग 30% था।3
एक छोटा प्रयोग एक आदिवासी गाँव में हुआ: फ़रवरी 2012 से जनवरी 2013 तक, हर वयस्क को 300 और हर बच्चे को 150 रुपये महीना। 756 लोगों को कुल 19.45 लाख रुपये मिले, और तुलना एक दूसरे आदिवासी गाँव से की गई।3 कुल मिलाकर नौ गाँवों के लगभग 6,000 लोगों को बेसिक इनकम मिली। बड़े प्रयोग में 5,547 लोग पात्र थे, और सर्वे में 2,034 घरों के 11,231 लोग शामिल थे। गाँवों का चुनाव बेतरतीब (रैंडम) तरीक़े से हुआ, और सर्वे के सवाल एक स्वतंत्र अर्थशास्त्री ने बनाए।3
क्या मिला
नतीजे 2015 में सरथ दावला, रेनाना झाबवाला, सौम्या कपूर मेहता और गाय स्टैंडिंग की किताब "Basic Income: A Transformative Policy for India" में छपे, जो मुफ़्त में ऑनलाइन उपलब्ध है।3 सबसे साफ़ असर पोषण पर था। बेसिक इनकम वाले गाँवों में सामान्य वज़न (उम्र के हिसाब से) वाली लड़कियों का हिस्सा 25 प्रतिशत अंक से ज़्यादा बढ़ा, जो कंट्रोल गाँवों के दोगुने से भी ज़्यादा था; लड़कों में यह 14 अंक बढ़ा, जबकि कंट्रोल गाँवों में 9। आदिवासी गाँव में गंभीर रूप से कम वज़न वाले बच्चों का हिस्सा 32% से घटकर 15% रह गया।3
स्कूल में भी फ़र्क़ दिखा: बेसिक इनकम पाने वाले 29.0% घरों ने बताया कि बच्चों की हाज़िरी बढ़ी, जबकि न पाने वालों में 13.5% ने।3 काम घटा नहीं, बदला: सबसे बड़ा बदलाव मज़दूरी से अपनी खेती और अपने काम की ओर था, और सहायक आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने का सबसे ज़्यादा फ़ायदा महिलाओं को हुआ।3 क़र्ज़ घटा: बेसिक इनकम वाले गाँवों के 12.5% घरों ने क़र्ज़ घटाया और 5% ने बढ़ाया, जबकि कंट्रोल गाँवों में सिर्फ़ 5% ने घटाया और 58% से ज़्यादा ने बढ़ाया।3 विकलांग सदस्यों वाले जिन घरों को बेसिक इनकम नहीं मिली, उनमें 27% की कमाई घटी, जबकि पाने वालों में 12% की।3
| क्षेत्र | बेसिक इनकम वाले गाँव | कंट्रोल गाँव |
|---|---|---|
| सामान्य वज़न वाली लड़कियाँ | 25 अंक से ज़्यादा बढ़त | इसके आधे से कम |
| सामान्य वज़न वाले लड़के | +14 अंक | +9 अंक |
| स्कूल हाज़िरी बढ़ी (घरों के अनुसार) | 29.0% | 13.5% |
| क़र्ज़ घटाया | 12.5% घर | 5% घर |
| क़र्ज़ बढ़ाया | 5% घर | 58% से ज़्यादा घर |
सीमाएँ
इन नतीजों को ध्यान से पढ़ना चाहिए। सिर्फ़ 8 गाँवों को पैसा मिला और 12 गाँव तुलना के लिए थे; रैंडम चुनाव गाँव के स्तर पर हुआ, व्यक्ति के स्तर पर नहीं। प्रयोग लगभग डेढ़ साल चला। ज़्यादातर नतीजे सर्वे में लोगों के अपने जवाबों पर आधारित हैं। किताब उसी टीम ने लिखी जिसने प्रयोग की रूपरेखा बनाई थी, बाहरी मूल्यांकनकर्ताओं ने नहीं। किताब ख़ुद बताती है कि SEWA वाले गाँवों में वज़न में सुधार 27 अंक था और बाक़ी गाँवों में 20 से कम, यानी असर का एक हिस्सा संगठन का भी हो सकता है, सिर्फ़ पैसे का नहीं।3 लेखक इस मूल्यांकन को ख़ुद "work-in-progress" कहते हैं।3 हमें इस प्रयोग का कोई स्वतंत्र, पीयर-रिव्यू किया हुआ पुनर्विश्लेषण नहीं मिला।
रायफिर भी, भारत के लिए यह प्रयोग अहम है, क्योंकि इसने हर व्यक्ति को, हर महीने, बिना शर्त पैसा देकर देखा, और जिस डर की सबसे ज़्यादा बात होती है, कि लोग काम छोड़ देंगे या पैसा उड़ा देंगे, उसका संकेत नहीं मिला। यह बड़े, लंबे और स्वतंत्र रूप से जाँचे गए अध्ययनों का विकल्प नहीं है, लेकिन अच्छा शुरुआती सबूत है। इसका सार हमारी टाइमलाइन पर भी है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17: "विचार करने का समय"
भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 का नौवाँ अध्याय पूरी तरह UBI पर था। उसने बताया कि केंद्र की लगभग 950 योजनाएँ और उप-योजनाएँ हैं, जिन पर बजट का आवंटन GDP का लगभग 5% है, और अक्सर सबसे ग़रीब ज़िलों को ही कम पैसा मिलता है, जिसे उसने "गंभीर ग़लत आवंटन" का सबूत कहा।4 उसका अनुमान था कि साल में 7,620 रुपये की UBI, अगर 75% आबादी को दी जाए, तो उसका ख़र्च GDP का 4.9% होगा।4
सर्वेक्षण ने विरोध के तर्क भी गिनाए: पैसा दिखावटी ख़र्च में जा सकता है, लोग काम कम कर सकते हैं, घर के भीतर पैसे पर पुरुषों का नियंत्रण हो सकता है, और एक बार शुरू हुई योजना को बंद करना राजनीतिक रूप से मुश्किल होता है। उसका निष्कर्ष था कि UBI ऐसा विचार है जिसका समय "शायद तुरंत लागू करने के लिए नहीं, लेकिन कम से कम गंभीर सार्वजनिक विचार-विमर्श के लिए" आ गया है।4 2019 के चुनाव से पहले कांग्रेस ने NYAY का वादा किया, जिसमें सबसे ग़रीब 20% परिवारों को साल में 72,000 रुपये देने की बात थी।5 यह भी लागू नहीं हुआ।
PM-KISAN: किसानों के लिए नकद
जो लागू हुआ, वह था PM-KISAN। 24 फ़रवरी 2019 से ज़मीन वाले हर पात्र किसान परिवार को साल में 6,000 रुपये, 2,000 रुपये की तीन किस्तों में, सीधे बैंक खाते में मिलते हैं; आयकर देने वाले, सरकारी कर्मचारी और ऊँची आय वाले बाहर हैं।6 30 अक्टूबर 2026 को 24वीं किस्त में 9.34 करोड़ से ज़्यादा किसानों को लगभग 18,690 करोड़ रुपये मिले, और अब तक कुल 4.64 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा बाँटे जा चुके हैं।7 2026-27 के बजट अनुमान में इसके लिए 63,500 करोड़ रुपये हैं।8 यह नियमित और नकद है, लेकिन परिवार के स्तर पर है और सिर्फ़ ज़मीन वाले किसानों के लिए; भूमिहीन खेतिहर मज़दूर इसमें नहीं आते।
महिलाओं को नकद: लाडली बहना, लाडकी बहीण और दूसरे राज्य
मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना की घोषणा 28 जनवरी 2023 को, उसी साल के विधानसभा चुनाव से पहले हुई, और पहला भुगतान 10 जून 2023 को हुआ। रक़म 1,000 रुपये से शुरू हुई, अक्टूबर 2023 से 1,250 और नवंबर 2025 से 1,500 रुपये हुई।9 पात्र हैं 21 से 60 साल से कम उम्र की विवाहित महिलाएँ (विधवा, तलाक़शुदा और परित्यक्ता भी), जिनके परिवार की स्व-घोषित सालाना आय 2.5 लाख रुपये से ज़्यादा न हो; आयकर देने वाले, सरकारी कर्मचारी या पेंशनभोगी वाले परिवार, पाँच एकड़ से ज़्यादा ज़मीन या चार-पहिया गाड़ी वाले परिवार बाहर हैं। पोर्टल पर कुल पात्र आवेदक 1,25,22,542 हैं।1 बजट 2025-26 के 18,669 करोड़ से बढ़कर 2026-27 में 23,883 करोड़ रुपये हो गया। अक्टूबर 2026 में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा, "मुझे नहीं पता था कि मुख्यमंत्री बनने के साथ इतना भारी वित्तीय बोझ आएगा"।9
महाराष्ट्र की मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहीण योजना जुलाई 2024 से 21 से 65 साल की महिलाओं को 1,500 रुपये महीना देती है।102 सत्तारूढ़ महायुति ने चुनावी घोषणापत्र में इसे 2,100 रुपये करने का वादा किया था, लेकिन 2025-26 के बजट में बढ़ोतरी नहीं हुई; आवंटन पिछले साल के 46,000 करोड़ से घटकर 36,000 करोड़ रुपये रहा।10 सत्यापन अभियान के बाद 92 लाख से ज़्यादा लाभार्थी हटाए गए, पहले चरण के लगभग 2.43 से 2.47 करोड़ पात्रों में से। लगभग 60 लाख महिलाएँ अनिवार्य e-KYC पूरा नहीं कर पाईं, और लगभग 14-15 लाख की परिवार आय 2.5 लाख रुपये की सीमा से ज़्यादा थी। CAG ने योजना के 3,541 करोड़ रुपये के ख़र्च पर सवाल उठाया।11
PRS के अनुसार 2025-26 में ये बारह राज्य ऐसी योजनाएँ चला रहे थे:2
| राज्य | योजना | रुपये प्रति माह | बजट 2025-26 (करोड़ रुपये) |
|---|---|---|---|
| महाराष्ट्र | माझी लाडकी बहीण | 1,500 | 36,000 |
| कर्नाटक | गृह लक्ष्मी | 2,000 | 28,608 |
| पश्चिम बंगाल | लक्ष्मीर भंडार | 1,000–1,200 | 26,700 |
| मध्य प्रदेश | लाडली बहना | 1,250 | 18,669 |
| तमिलनाडु | मगलिर उरिमै तोगै | 1,000 | 13,807 |
| झारखंड | मईयां सम्मान | 2,500 | 13,363 |
| ओडिशा | सुभद्रा | 833 | 10,145 |
| छत्तीसगढ़ | महतारी वंदन | 1,000 | 5,500 |
| दिल्ली | महिला समृद्धि | 2,500 | 5,110 |
| असम | ओरुनोदोई | 1,250 | 5,000 |
| हरियाणा | लाडो लक्ष्मी | 2,100 | 5,000 |
| हिमाचल प्रदेश | प्यारी बहना | 1,500 | 138 |
ये 2025-26 के बजट के आँकड़े हैं; कई राज्यों में रक़म बाद में बदली है, जैसे मध्य प्रदेश में नवंबर 2025 से 1,500 रुपये।9 PRS ने यह भी लिखा कि इन बारह में से छह राज्यों का राजस्व घाटे में रहने का अनुमान है, और इन भुगतानों से मध्य प्रदेश का राजस्व अधिशेष GSDP के 1.1% से घटकर 0.4% रह जाता है।2
पैसा कहाँ जाता है
इन योजनाओं के असर पर अभी गिने-चुने अध्ययन हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के जुलाई 2026 के एक वर्किंग पेपर में SBI के अर्थशास्त्रियों ने बैंक खातों के आँकड़ों से देखा कि लाडकी बहीण से लाभार्थियों का महीने के अंत का बैलेंस लगभग 84% (6,884 रुपये) और ख़र्च लगभग 46% (1,349 रुपये) बढ़ा; ओडिशा की सुभद्रा योजना में बैलेंस लगभग 45% और ख़र्च 28% बढ़ा। हर अतिरिक्त रुपये में से लगभग 90 पैसे ख़र्च हुए, जिसे लेखक नक़दी की तंगी का संकेत मानते हैं।12 तुलना उन महिलाओं से की गई जिनकी पारिवारिक आय पात्रता सीमा से थोड़ी ऊपर थी। यह खातों का आँकड़ा है: इससे बचत और ख़र्च दिखता है, लेकिन पोषण, पढ़ाई या घर में फ़ैसलों पर असर नहीं।
क्या यह बेसिक इनकम है?
बेसिक इनकम अर्थ नेटवर्क (BIEN) बेसिक इनकम को "बिना आय जाँच या काम की शर्त के, सबको व्यक्तिगत आधार पर बिना शर्त दिया जाने वाला नियमित नकद भुगतान" कहता है।14 इस पैमाने पर तीनों को रखें:
| मानदंड | मध्य प्रदेश प्रयोग | लाडली बहना | PM-KISAN |
|---|---|---|---|
| नियमित | हाँ, हर महीने | हाँ, हर महीने | हाँ, साल में तीन बार |
| नकद | हाँ | हाँ | हाँ |
| व्यक्तिगत | हाँ, हर वयस्क और बच्चा | हाँ, महिला के अपने खाते में | नहीं, किसान परिवार |
| सार्वभौमिक | गाँव के सभी लोग | नहीं, 21–60 साल की विवाहित महिलाएँ | नहीं, ज़मीन वाले किसान |
| बिना शर्त | हाँ | आय और दूसरी शर्तें | आय और दूसरी शर्तें |
मध्य प्रदेश का प्रयोग, छोटे पैमाने पर ही सही, लगभग पूरी तरह बेसिक इनकम था। आज की योजनाएँ नियमित और नकद हैं, और महिलाओं की योजनाएँ व्यक्तिगत भी, लेकिन वे सार्वभौमिक नहीं हैं: वे आय, उम्र, वैवाहिक स्थिति या ज़मीन से बँधी हैं। उन्हें "लक्षित नकद हस्तांतरण" कहना ज़्यादा सही है।
सबके लिए कितना ख़र्च होगा?
अगर लाडली बहना जितनी रक़म, 1,500 रुपये महीना, भारत के हर वयस्क को दी जाए, तो बेसिक इनकम कैलकुलेटर के अनुसार सकल ख़र्च साल में लगभग 18.6 लाख करोड़ रुपये होगा, यानी GDP का लगभग 5.4%। तुलना के लिए, 2025-26 में भारत का नाममात्र GDP 346.36 लाख करोड़ रुपये था;13 महिलाओं की राज्य योजनाएँ मिलकर GDP का लगभग 0.5% हैं,2 और PM-KISAN लगभग 0.18%।8 आर्थिक सर्वेक्षण का 4.9% का अनुमान इससे कम रक़म (साल में 7,620 रुपये) और 75% आबादी के लिए था।4 ये सकल रक़में हैं; दूसरी योजनाओं की जगह लेने से होने वाली बचत इनमें नहीं गिनी गई।
न "भारत में बेसिक इनकम आ गई", न "बस चुनावी रेवड़ी"
रायलाडली बहना और लाडकी बहीण बेसिक इनकम नहीं हैं। वे कुछ महिलाओं के लिए हैं, शर्तों के साथ, और कई बार चुनाव से ठीक पहले शुरू या बढ़ाई गईं। जब ख़र्च भारी पड़ता है, तो रक़म बढ़ाने के वादे टलते हैं और सत्यापन के नाम पर सूचियाँ छोटी होती हैं; e-KYC पूरा न कर पाने वाली हर महिला अपात्र नहीं होती।
लेकिन उन्हें सिर्फ़ "रेवड़ी" कहकर ख़ारिज करना भी ठीक नहीं। करोड़ों महिलाओं को हर महीने उनके अपने खाते में नकद पहुँचाने का ढाँचा अब बन चुका है, और खातों के आँकड़े बताते हैं कि यह पैसा ज़्यादातर ख़र्च और बचत में काम आता है। मध्य प्रदेश के प्रयोग ने दिखाया था कि हर व्यक्ति को मिलने वाला बिना शर्त पैसा पोषण, पढ़ाई और कामकाज में बदल सकता है।
सवाल यह है कि क्या ये योजनाएँ चुनावी चक्र से आगे बढ़कर एक स्थिर, क़ानूनी और ईमानदारी से जाँची गई न्यूनतम आय की ओर जाएँगी। इसके लिए तीन चीज़ें चाहिए: टिकाऊ पैसा, साफ़ और कम शर्तें, और स्वतंत्र मूल्यांकन। जिस राज्य ने 2011 में यह प्रयोग किया था, उसके पास आज इसका सबसे बड़ा मौक़ा भी है।
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स्रोत
- Government of Madhya Pradesh — Mukhyamantri Ladli Behna Yojana official portal (eligibility and applicant counts, checked Nov 2026; in Hindi) ↩
- PRS Legislative Research — State of State Finances 2025-26 (Oct 2025; PDF) ↩
- Sarath Davala, Renana Jhabvala, Soumya Kapoor Mehta and Guy Standing — Basic Income: A Transformative Policy for India (Bloomsbury Academic, 2015; open access PDF via OAPEN) ↩
- Ministry of Finance, Government of India — Economic Survey 2016-17, Chapter 9: Universal Basic Income: A Conversation With and Within the Mahatma (Jan 2017; PDF) ↩
- Scroll.in — Congress promises Rs 72,000 a year to the poorest 20% of families under NYAY (25 Mar 2019) ↩
- Press Information Bureau — PM-KISAN backgrounder for the 21st instalment (19 Nov 2025; PDF) ↩
- Press Information Bureau — 24th instalment of PM-KISAN: over Rs 18,690 crore to 9.34 crore farmers (30 Oct 2026) ↩
- Union Budget 2026-27 — Notes on Demands for Grants, Demand No. 1, Department of Agriculture and Farmers Welfare (PDF) ↩
- Outlook India — Why MP CM Mohan Yadav is calling Ladli Behna a heavy financial burden now (6 Oct 2026) ↩
- Business Today — Maharashtra Budget 2025: Ladki Bahin payout has no mention; opposition accuses government of not fulfilling poll promises (11 Mar 2025) ↩
- Free Press Journal — Maharashtra’s Ladki Bahin scheme: over 92 lakh women removed after verification (13 Jul 2026) ↩
- Economic Advisory Council to the Prime Minister — Soumya Kanti Ghosh and Shagishna K, Unconditional Women Cash Transfer Programmes in India: Evidence from Maharashtra and Odisha, Working Paper 52/2026 (Jul 2026; PDF) ↩
- Press Information Bureau (MoSPI) — Provisional Estimates of Annual GDP for 2025-26 (5 Jun 2026; PDF) ↩
- BIEN — About basic income ↩